वैश्विक वित्तीय बाजार में इस वक्त सबसे बड़ा भूचाल आया हुआ है—क्या अमेरिकी डॉलर की दशकों पुरानी तानाशाही अब खत्म होने की कगार पर है?
जनवरी से अगस्त 2026 के बीच डॉलर इंडेक्स (DXY) करीब 10% गिरकर 95.44 के 4 साल के निचले स्तर पर आ चुका है, जिसने पूरी दुनिया के केंद्रीय बैंकों की नींद उड़ा दी है।
आखिर हुआ क्या?
अमेरिका पर 39 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड कर्ज का बोझ और रूस के 300 अरब डॉलर के रिजर्व फ्रीज करने की अमेरिकी सनक का अब उल्टा असर दिखने लगा है।
वैश्विक संस्था OMFIF के सर्वे में पहली बार दुनिया के 74 केंद्रीय बैंकों में से अधिकांश ने डॉलर होल्डिंग घटाने का ऐलान किया है, जबकि रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी 25% तक पहुंच गई है।
लेकिन असली असर कहाँ पड़ेगा?
आम भारतीय के लिए यह खबर सीधी जेब से जुड़ी है: डॉलर कमजोर होने से कच्चा तेल, सोना और विदेशी इलेक्ट्रॉनिक्स सस्ते हो जाएंगे, जिससे देश में महंगाई पर लगाम लगेगी।
हालाँकि, सिक्का दो पहलुओं वाला है—डॉलर के गिरने से IT, फार्मा और टेक्सटाइल जैसे भारतीय एक्सपोर्टर्स की कमाई घटेगी और देश के फॉरेक्स रिजर्व की वैल्यू पर भी दबाव बनेगा।
सोशल मीडिया पर लोग क्यों भड़क गए?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बहस छिड़ी है: एक धड़ा इसे ‘अमेरिका का पतन’ बताकर जश्न मना रहा है, तो दूसरा पक्ष आगाह कर रहा है कि बिना किसी ठोस विकल्प के डॉलर का गिरना ग्लोबल मार्केट में तबाही लाएगा।
BRICS द्वारा अपनी मुद्रा लाने की चर्चाओं पर भारत ने साफ कर दिया है कि वह डॉलर विरोधी किसी गुट का हिस्सा बनने के बजाय सिर्फ अपने रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण पर ध्यान देगा।
अगले 24 घंटे क्यों महत्वपूर्ण हैं?
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की आगामी नीतिगत टिप्पणियों और जेपी मॉर्गन जैसे दिग्गजों के बयानों पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
अगर डॉलर में गिरावट का यह दौर जारी रहता है, तो वैश्विक बाजारों में भारी उथल-पुथल मच सकती है, जिसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार की चाल तय करेगा।
